Skip to main content

Posts

समस्या:- धान की जड़ों में आ रही है "गठान" आखिर क्या करे किसान

  समस्या:- धान की जड़ों में आ रही है "गठान" आखिर क्या करे किसान??? धान की जड़ों में गठान की समस्या। पिछले कुछ सालों से यह समस्या धान की फसल में काफी बढ़ चुकी है। कई किसान भाई इसकी समस्या का निवारण एवं कारण जानना चाहते है।  आज की कड़ी में डॉ गजेंन्द्र चन्द्राकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर इस समस्या का कारण व निवारण बताएंगे। कारण यह रोग जड़ गांठ सूत्रकृमि (निमोटोड) से होता है, जो कि बहुत ही छोटे होते हैं। इन्हें सूक्ष्मदर्शी के माध्यम से ही देखा जा सकता है। ये कीटाणु मिट्टी में रहते हैं और पौधों की जड़ में घुस जाते हैं, जिससे गांठें बनने लगती हैं। लक्षण पौधशाला और खेत में धान की फसल का पीला पड़ना, पौधों की असमान वृद्धि एवं पत्तियों का आकार कम होना। सूत्रकृमी ग्रसित फसल जल्दी सूख जाती है। एम. ग्रेमिनिकोला अक्सर जड़ ऊतकों के कार्यों में बाधा पहुंचाता है। उनके द्वारा संक्रमित पौधों की जड़ें मिट्टी से उचित पोषण एवं पानी नहीं ले पाती हैं। जिसके कारण पौधे  के ऊपरी भागों में लक्षण उत्पन्न  होते हैं। जिसके कारण पौधे के ऊपरी भागों में लक्षण उत्पन्न होत...

संचालक (समेति) रायपुर ने किया फसलों का निरीक्षण

संचालक (समेति) रायपुर ने किया फसलों का निरीक्षण आज दिनांक- 11/02/2021 को श्री जी. के. निर्माम संचालक (समेति) रायपुर ने विकासखण्ड फिंगेश्वर में विभागीय योजनाओं के अंतर्गत आयोजित फसल प्रदर्शन का राज्य स्तरीय निरीक्षण किया। गौरतलब है कि विकासखण्ड फिंगेश्वर में पहली बार आत्मा योजना अंतर्गत ग्राम पसौद में रागी फसल का प्रदर्शन कृषि विभाग द्वारा आयोजित किया गया है। जिसका निरीक्षण किया गया।  CG- RAGI-02 किस्म के बीज का वितरण ग्राम पसौद में किया गया है। इसी प्रकार TRFA योजनान्तर्गत मूंगफल्ली फसल प्रदर्शन 50.00 हेक्टेयर , एवं  राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन  अंतर्गत चना फसल प्रदर्शन 50.00 हे. ग्राम-बोड़की एवं  सरसों मिनीकिट प्रदर्शन का भी निरीक्षण किया गया। एफ.आर.कश्यप उप संचालक कृषि जिला गरियाबंद ने कृषको को फसल चक्र अपनाने हेतु प्रेरित किया एवं फसल चक्र से होने वाले फायदे के  बारे में कृषको को विस्तार से बताया। श्री जी के निर्माम संचालक (समेति) रायपुर ने बताया कि रागी, मूंगफल्ली,चना की खेती धान की खेती की अपेक्षा में अधिक लाभकारी है इसकी खेती करने से किसानों की आय में नि...

औषधि:-जाने विधारा के बारे में।

औषधि:-जाने विधारा के बारे में। #आपने अपने आसपास के उद्यानों और घरों में #विधारा की सुंदर लताओं को देखा होगा। यह लता सिर्फ सजावटी पादप ही नही अपितु औषधीय गुणों से भी सम्पन्न है। विधारा का वानस्पतिक यानी लैटिन नाम आर्जीरिआ नरवोसा है। यह कान्वाल्वुलेसी (Convolvulaceae) कुल का पौधा है। अंग्रेजी भाषा में इसका नाम ऐलीफैण्ट क्रीपर (Elephant creeper) और वूली मार्निंग ग्लोरी (Wolly morning glory) है। इसके अलावा इसे विभिन्न भाषाओं में समन्दर-का-पाटा, समुद्रशोष, घावपत्ता, विधारावृद्धदारुक, आवेगी, छागात्री, वृष्यगन्धिका, ऋक्षगन्धा,अजांत्री, दीर्घवल्लरी मोन्डा,चन्द्रपाडा, समुद्रवल्लि आदि नामों से भी जाना जाता है। #विधारा का इस्तेमाल ज्यादा दर लोग जैसे - जोड़ों का दर्द, गठिया, बवासीर, सूजन, डायबिटीज, खाँसी, पेट के कीड़े, सिफलिश, एनीमिया, मिरगी, मैनिया, दर्द और दस्त में किया जाता है। और हम आपको बता दे विधारा की जड़े इस्तेमाल करने से बहुत राहत और आराम मिलता है | पेशाब के रोगों तथा त्वचा संबंधी रोगों और बुखार दूर करने में उपयोगी होती है। विधारा की जड़े का एथेनॉलिक सार सूजन दूर करने के साथ-साथ घाव को...

गेहूं की फसल का रोग और कीटों से बचाव **

  गेहूं की फसल का रोग और कीटों से बचाव  भारत देश में गेहूं का उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान है लगभग देश के सभी राज्यों में किसान गेहूं की खेती करते हैं|  गेहूं में बीमारियों सुत्रकृमियों तथा हानिकारक कीटों के कारण 5–10 प्रतिशत उपज की हानि होती है और दानों तथा बीजों की गुणवत्ता भी खराब होती है| गेहूं की नई प्रजातियों को जारी करने से पहले रतुआ रोग तथा पर्ण झुलसा रोगों की प्रतिरोधिता के लिए कई साल तक जांचा जाता है तथा अन्य बीमारियों तथा कीटों के लिए कम से कम दो साल तक परीक्षण किया जाता है| इनमें से केवल उच्च प्रतिरोधिता वाली प्रजातियों की ही संस्तुति की जाती हैं| लेकिन एक ही प्रजाति में सभी प्रकार के रोगों, सूत्रकृमियों तथा हानिकारक कीटों के लिए प्रतिरोधिता होना एक कठिन कार्य हैं| समय के साथ–साथ रोगजनकों का भी विकास होता रहता है और प्रकृति में इनकी नवीनतम प्रजातियाँ विकसित होती रहती है| गेहूं की फसल के रोग काला अथवा तना किट्ट- गेहूं की फसल का यह रोग प्रभावित पौधों के तने, संधिस्तंभ, पर्णछंद, पत्तियों और डंठलों के ऊपर लाल भूरे रंग के छोटे-छोटे धब्बे (यूरीडीनोस्पोट) बनते हैं, जो धीरे-धीरे बड...

लक्ष्मी तरु- लक्ष्मी की बरसात करता है अनूठा पेड़ "लक्ष्मी तरु"

  लक्ष्मी तरु- लक्ष्मी की बरसात करता है अनूठा पेड़ "लक्ष्मी तरु" Simarouba Glauca ********************************** कैंसर में भी है उपयोगी यह पेड़ जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है एक पौधा ऎसा है जो कि हर मायने में इतना बड़ा वरदान है कि इससें लक्ष्मी की वृष्टि होती है। इस पादप को भारत वर्ष में पनपाया जा रहा है। इस पौधे का हर अंग कीमती है। यह पौधा धरती का कल्पवृक्ष ही कहा जा सकता है। असंख्य उपयोग वाले इस पौधे को अधिक से अधिक लगाकर आर्थिक व सामाजिक तरक्की में नये आयाम पाए जा सकते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि लक्ष्मी तरु Simarouba Glaucaके बारे में व्यापक प्रचार प्रसार कर इसे बढ़ावा दिया जाए। इस पौधे का नाम "लक्ष्मी तरु"है। लक्ष्मी तरु मूलतः उत्तरी अमेरिका का पेड़ है।इसे स्वर्ग का पेड़(पैराडाइज ट्री)कहा जाता है। 2006 में राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम व आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री रविशंकर जी के द्वारा भारत में लगाया गया था।अब तक देश भर में 20 लाख से अधिक पौधे (लक्ष्मी तरु) आर्ट ऑफ लिविंग के द्वारा लगाया जा चूका है। यह एक बहुपयोगी वृक्ष है।जिसके सभी अंग उपयोग में आते हैं।इसके...

कोरिया जिले के कृषि उत्पाद बिक रहे दिल्ली हाॅट में

कोरिया जिले के कृषि उत्पाद बिक रहे दिल्ली हाॅट में  जिला प्रषासन के सहयोग एवं कृषि विज्ञान केन्द्र के तकनीकी मार्गदर्षन में गठित किसान उत्पादक संगठन, कोरिया एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड में सम्मिलित आदिवासी कृषकों से कच्चे कृषि उत्पादों, उद्यानिकी, संगध उत्पादों, मधुमक्खी पालन, देषी गाध का दूध इत्यादि को संग्रहण कर कृषि विज्ञान केन्द्र कोरिया के माध्यम से स्थापित विभिन्न मूल्यवर्धन एवं प्रसंस्करण ईकाईयांें में शुद्ध एवं देषी तैयार उत्पादों-देषी सुगंधित चावल (जीराफुल, रानीकाजल, लोहन्दी, लालू) देषी चावल- (केतकी, छिन्दमौरी, करहनी, खिरासार, नरपती) देषी दाल (अरहर, चना, कुल्थी, मूंग, मसूर इत्यादि) प्राकृतिक शहद- (करंज, जंगली वन तुलसी, सरसों) संगध तेल-(लेमनग्रास, सेट्रोनेला, पामारोजा) लेमनग्रास चायपत्ती, हस्त निर्मित साबुन- (लेमनग्रास एवं सिन्दुर, लेमनग्रास एवं हल्दी, पामारोजा एवं सिन्दुर, पामारोजा एवं हल्दी) अगरबत्ती-(लेमनग्रास एवं सेट्रोनेला) शकरकन्द आटा, देषी गाय का ए-टू घी, सुखा मसरुम एवं मसरुम पावडर इत्यादि उत्पाद सुन्दर आकर्षक पैकिंग में गुणवत्ता प्रमाणिकरण के साथ भारतीय जनजातीय स...

समसामयिक सलाह-फरवरी माह में इन कृषि एवं बागवानी कार्यों को करें, होगी बेहतर उपज

  समसामयिक सलाह- फरवरी माह में इन कृषि एवं बागवानी कार्यों को करें, होगी बेहतर उपज कृषि कार्य करने के लिए किसानों के पास ये जानकारी होनी बहुत जरुरी है कि वो किस माह में कौन-सा कृषि कार्य करें. क्योंकि मौसम कृषि कार्य को बहुत प्रभावित करता है. इसलिए तो अलग- अलग सीजन में अलग फसलों की खेती की जाती है ताकि फसल की अच्छी पैदावार ली जा सकें. ऐसे में आइये जानते है कि फरवरी माह में किसान कौन-सा कृषि कार्य करें- गेहूं बुवाई के समय के हिसाब से गेहूं में दूसरी सिंचाई बुवाई के 40-45 दिन बाद तथा तीसरी सिंचाई 60-65 दिन की अवस्था में कर दें. चौथी सिंचाई बुवाई के 80-85 दिन बाद बाली निकलने के समय करें। ■गेहूँ के खेत में चूहों का प्रकोप होने पर जिंक फास्फाइड से बने चारे अथवा एल्यूमिनियम फास्फाइड की टिकिया का प्रयोग करें. जौ खेत में यदि कंडुआ रोग से ग्रस्त बाली दिखाई दे तो उसे निकाल कर जला दें. चना चने की फसल को फली छेदक कीट से बचाव के लिए फली बनना शुरू होते ही बैसिलस थूरिनजेन्सिस (बी.टी.) 1.0 किग्रा अथवा फेनवैलरेट 20 प्रतिशत ई.सी.1.0 लीटर अथवा क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई.सी. 2.0 लीटर प्रति हेक्टेयर 500-6...