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Showing posts from April, 2026

आजोला (Azolla) का धान की फसल में उपयोग व उत्पादन विधि

आजोला (Azolla) का धान की फसल में उपयोग व उत्पादन विधि 🌱 आजोला क्या है? आजोला एक छोटी जलफर्न (floating fern) है जो पानी की सतह पर तैरती है। इसमें Anabaena नामक नीला-हरित शैवाल रहता है जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिर करता है। इसलिए यह धान में जैव उर्वरक (Biofertilizer) के रूप में बहुत उपयोगी है। 🌾 धान की फसल में आजोला का उपयोग 1. हरी खाद के रूप में धान रोपाई से पहले खेत में आजोला बढ़ाकर मिट्टी में मिला दें। इससे नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। 2. रोपाई के बाद खेत में धान रोपाई के 7–10 दिन बाद पानी भरे खेत में आजोला छोड़ें। यह फैलकर सतह ढक देता है। लाभ ✅ 20–30 किलो नाइट्रोजन/हेक्टेयर तक उपलब्ध करा सकता है ✅ यूरिया की बचत ✅ खरपतवार कम उगते हैं ✅ नमी संरक्षण ✅ मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है ✅ उपज में सुधार आजोला उत्पादन विधि (नर्सरी/तालाब में) गड्ढा/बेड विधि आकार: 2 मीटर × 1 मीटर × 0.2 मीटर गड्ढा सामग्री : ▪️प्लास्टिक शीट ▪️10–15 किलो बारीक मिट्टी ▪️2–5 किलो गोबर खाद ▪️100 ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट ▪️पानी 5–10 सेमी ▪️500 ग्राम से 1 किलो आजोला बीज कल्चर तरीका : ▪️गड्ढा बनाकर प्लास्टिक बिछाएं। ▪️मिट्...

नील हरित काई (Blue Green Algae / BGA) का निर्माण व धान में उपयोग

नील हरित काई (Blue Green Algae / BGA) का निर्माण व धान में उपयोग नील-हरित शैवाल, जिसे वैज्ञानिक रूप से सायनोबैक्टीरिया कहा जाता है, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में अत्यंत उपयोगी है। यह प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से भूमि में पोषक तत्वों की पूर्ति करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके उपयोग से प्रति हेक्टेयर लगभग 25 से 30 किलोग्राम तक नाइट्रोजन की आपूर्ति संभव है, जिससे रासायनिक उर्वरकों की जरूरत कम पड़ती है। इस जैव उर्वरक का उपयोग विशेष रूप से धान की फसलों में लाभकारी है। जलभराव वाले खेतों में नील-हरित शैवाल तेजी से विकसित होता है, जिससे धान उत्पादन में वृद्धि और गुणवत्ता में सुधार होता है। इसके अतिरिक्त, यह क्षारीय एवं बंजर भूमि की उत्पादकता बढ़ाने में भी सहायक है। इस वर्ष उचित मूल्य पर कृषि विभाग द्वारा किसानों को नील हरित शैवाल उपलब्ध होगा।  इससे न केवल उनकी खेती की लागत में कमी आएगी, बल्कि वे जैविक खेती की ओर भी प्रेरित होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि जैव उर्वरकों के उपयोग से मृदा स्वास्थ्य बेहतर हो...

नील हरित काई की उत्पादन तकनीक

नील हरित शैवाल उत्पादन तकनीक  धान के खेत में नील हरित शैवाल का उपच नील हरित शैवाल के उपयोग से लाभ  नील हरित शैवाल उत्पादन की विधि  उत्पादन में ध्यान रखने योग्य बातें  नील हरित शैवाल कल्चर के उत्पादन की ग्रामीण तकनीक  नील हरित शैवाल जलीय पौधों का एक विशेष समूह होता है। इसे साइनो बैक्टीरिया भी कहा जाता है। यह एक कोशिकीय जीवाणु है और शैवाल के आकार का होता है, इसलिए इसे नील हरित शैवाल भी कहते हैं। इस जीवाणु को धान की फसल के लिए वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को भूमि में संस्थापित कराने के उद्देश्य से उपयोग में लाया जाता है। नील हरित शैवाल प्रकाश संश्लेषण से ऊर्जा ग्रहण करके वायुमंडलीय नाइट्रोजन का भूमि में स्थिरीकरण करता है। यह एक स्वतंत्र रूप से जीवनयापन करने वाला जीवाणु होता है, जिसे दलहनी फसलों की भाति ऊर्जा के लिए धान के पौधे पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। धान के खेत में चूंकि सदैव पानी भरा रहता है, इसलिए नील हरित शैवाल की वृद्धि एवं विकास के लिए अनुकूल स्थितियां विद्यमान रहती हैं। नील हरित शैवाल द्वारा नाइट्रोजन का स्थिरीकरण एक विशिष्ट कोशिका द्वारा किया जाता है। इसके उपयोग से 20 से 40 कि.ग्रा....