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मध्य प्रदेश कृषि विभाग ने किया आगाह / शाम 7 से 9 बजे के बीच आक्रमण कर सकता है टिड्‌डी दल, अलग-अलग समूह बनाकर निगरानी करें किसान।

मध्य प्रदेश कृषि विभाग ने किया आगाह / शाम 7 से 9 बजे के बीच आक्रमण कर सकता है टिड्‌डी दल, अलग-अलग समूह बनाकर निगरानी करें किसान। मंदसौर और नीमच से होते हुए टिड्डी दल उज्जैन पहुंचा। अब शाजापुर और देवास तक पहुंच गया है। राजस्थान की सीमा से लगे मंदसौर, नीमच और उज्जैन के कुछ क्षेत्रों में खतरा सबसे ज्यादा उज्जैन, शाजापुर और देवास तक पहुंचा टिड्डी दल, 20 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को ढंक चुका है शिवराज सिंह चौहान ने कहा- टिड्डी दल को भगाने के लिए जिलों में कृषि विभाग की टीमें जुटी हुई हैं  राजस्थान की सीमा से सटे मध्यप्रदेश के सीमावर्ती कुछ जिलों में टिड्डी दल के आने की सूचना के बाद प्रशासन ने संबंधित क्षेत्रों के किसानों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। गुरुवार को राजस्थान की सीमा से लगे मंदसौर, नीमच और उज्जैन जिले के कुछ क्षेत्रों में टिड्डी दल के आने की प्रशासनिक जानकारी के आधार पर बचाव और सतर्कता के लिए निर्देश कृषि विभाग की ओर से दिए गए हैं। वहीं, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि टिड्डी दल के मामले में स्थिति पर हमारीनजर है। कृषि विभाग के निर्देश में किसानों को सलाह दी गई है कि वे अप...

जैविक खेती- आपकी फसल को कीटों से बचाएंगी ये नीली, पीली पट्टियां

स्टिकी ट्रैप अक्सर किसान अपनी फसल में लगने वाले कीटों से परेशान रहते हैं, जिसके लिए तरह-तरह के कीटनाशक का इस्तेमाल करते रहते हैं। लेकिन किसान बिना कीटनाशक के इस्तेमाल के विना खर्चे के अपनी फसल को कीटों से बचा सकते हैं। उसके लिए किसन को सिर्फ कुछ नीली, पीली पट्टियों की ज़रूरत पड़ेगी, जिसे स्टिकी ट्रैप कहतै हैं। आधुनिक कृषि उत्पादन पद्धति में किसी नाशीजीव का नियंत्रण करने के लिए कम से कम रासायनिक छिड़काव करने का सुझाव दिया जाता है तथा यांत्रिक नियंत्रण के साधनों जैसे फेरोमोन ट्रैप (गंधपांस), प्रकाश प्रपंच (लाइट ट्रैप), ब्लू स्टिकी ट्रैप, येल्लो स्टिकी ट्रैप एवं बर्ड पर्चर (चिड़ियों का बैठक) आदि का इस्तेमाल अगर सही समय पर किया जाय तो फसल नुकसान को 40 से 50 प्रतिशत कम किया जा सकता है। क्या होता है स्टिकी ट्रैप स्टिकी ट्रैप दरअसल पतली सी चिपचिपी शीट होती है। यह फसलों की रक्षा बिना किसी रसायन के इस्तेमाल से करती है और रसायन के मुकाबले सस्ती भी रहती है। स्टिकी ट्रैप शीट पर कीट आ कर चिपक जाते हैं जिसके बाद वह फसल को नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं। स्टिकी ट्...

फसलों में कीट रोकथाम के लिए उपयोग करें फेरोमैन ट्रैप

फसलों में कीट रोकथाम के लिए उपयोग करें फेरोमैन ट्रैप  फसलों को कीटों से बचाने के लिए अक्सर काफी खर्च करना पड़ता है। लेकिन फेरोमोन ट्रैप के द्वारा आसानी से कम लागत में कीटों पर काबू पाया जा सकता है। फेरोमोन ट्रेप फसलों को नुकसान करने वाली सूंडियों के नर पतंगों के फंसाने के लिए चमकीले प्लास्टिक का बना होता है। इसमें कीप के आकार के मुख्य भाग पर लगे ढक्कन के मध्य में मादा कीट की गंध (ल्योर) लगाया जाता है, जो नर पतंगों को आकर्षित करता है। कीप के निचले भाग पर पालीथीन की थैली लगायी जाती है, जिसमें पतंगे जाते है। थैली के निचले मुख पर से रबर बैंड हटाकर फंसे पतंगे निकाल कर मार दिये जाते है। फेरोमोन ट्रेप को खेत में पतंगों की उपस्थिति पता करने के लिए 5-6 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से तथा अधिक संख्या में पकड़ने के लिए 15 से 20 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाया जाता है। इसे खेत में कीप पर लगे हत्थे द्वारा डंडे पर फसल की ऊंचाई से 1-2 फुट ऊपर लगाया जाता है। ल्यूर (गंध रबर) में गंधक रहित रबर पर मादा पतंगों की विशेष गंध (फेरोमोन) भरी होती है। विभिन्न प्रकार के पतंगों के लिए अलग-अलग ल्...

जैविक खेती:- भूमि और फसलों के लिए संजीवनी है ये खाद

नाडेप :- इस विधि को ग्राम पूसर जिला यवतमाल महाराष्ट के नारायम देवराव पण्डरी पाण्डे द्वारा विकसित की गई है। इसलिये इसे नाडेप कहते हैं। इस विधि में कम से कम गोबर का उपयोग करके अधिक मात्रा में अच्छी खाद तैयार की जा सकती है। टांके भरने के लिये गोबर, कचरा (बायोमास) और बारीक छनी हुई मिटटी की आवश्यकता रहती हैं। जीवांश को 90 से 120 दिन पकाने में वायु संचार प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। इसके द्वारा उत्पादित की गई खाद में प्रमुख रूप से 0.5 से 1.5% नत्रजन, 0.5 से 0.9% स्फुर एवं 1.2 से 1.4% पोटाश के अलावा अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व भी पाये जाते हैं। निम्नानुसार विभिन्न प्रकार के नाडेप टाकों से नाडेप कम्पोस्ट तैयार किया जा सकता है । 1 पक्का नाडेप 2 कच्चा नाडेप (भू नाडेप) 3 टटिया नाडेप क. पक्का नाडेप :- पक्का नाडेप ईटों के द्वारा बनाया जाता है । नाडेप टांके का आकार 10 फीट लंबा, 6 फीट चौड़ा और 3 फीट ऊंचा या 12*5*3 फीट का बनाया जाता है। ईटों को जोडते समय तीसरे, छठवे एवं नवें रद्दे में मधुमक्खी के छत्ते के समान 6''-7'' के ब्लाक/छेद छोड़ दिये जाते ...

जैविक खेती:-जानिए क्या है पंचगव्य और किसान भाई कैसे इसे अपने घर पर बना सकते है

पंचगव्य प्राचीन काल से ही भारत जैविक आधारित कृषि प्रधान देश रहा है। हमारे ग्रन्थों में भी इसका उल्लेख किया गया है। पंचगव्य का अर्थ है पंच+गव्य (गाय से प्राप्त पाँच पदार्थों का घोल) अर्थात गौमूत्र, गोबर, दूध, दही, और घी के मिश्रण से बनाये जाने वाले पदार्थ को पंचगव्य कहते हैं। प्राचीन समय में इसका उपयोग खेती की उर्वरक शक्ति को बढ़ाने के साथ पौधों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता था। विशेषतायें i. भूमि में जीवांशों (सूक्ष्म जीवाणुओं) की संख्या में वृद्धि ii. भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि iii. फसल उत्पादन एवं उसकी गुणवत्ता में वृद्धि iv. भूमि में हवा व नमी को बनाये रखना v. फसल में रोग व कीट का प्रभाव कम करना vi. स्थानीय संसाधनों पर आधारित vii. सरल एवं सस्ती तकनीक पर आधारित पंचगव्य बनाने की विधि प्रथम दिन2.5 कि.ग्रा. गोबर व 1.5 लीटर गोमूत्र में 250 ग्राम देशी घी अच्छी तरह मिलाकर मटके में डाल दें व ढक्कन अच्छी तरह से बंद कर दें। अगले तीन दिन तक इसे रोज हाथ से हिलायें। अब चौथे दिन सारी सामग्री को आपस में मिलाकर मटके में डाल दें व फिर से ढक्कन बंद कर दें।  अगले दिन इसे लकड़ी...

बाजार में नकली खाद-बीज की बिक्री जोरों पर, किसान ऐसे करें नकली-असली की पहचान।

  बाजार में नकली खाद-बीज की बिक्री जोरों पर, किसान ऐसे करें नकली-असली की पहचान। कृषि कार्य मे मुख्यतः बीज एवम उर्वरको के समय-समय पर कमी होने पर कई बार दुकानदारों के द्वारा मिलावटी बीज-खाद दे दिया जाता है जिससे फसलों के साथ साथ किसानों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है साथ पैदावार में भी काफी कमी आती है | किसानों के द्वारा अक्सर यह शिकायत की जाती है की उन्होंने ने जो बीज/खाद खरीदी है उसमें मिलावट है ।  सरकार के द्वारा भी हर वर्ष कई खाद, बीज, एवं उर्वरक प्रतिष्ठानों पर छापा मारी की जाती है जहाँ से काफी मात्रा में मिलावटी बीज/उर्वरक प्राप्त होता हैं । रसायनिक उर्वरक यूरिया में साधारण नमक, प्यरेट ऑफ पोटाश, एसएसपी, रॉक फास्फेट, चिकनी मिट्टी आदि की मिलावट का अंदेशा रहता है। इसी तरह डीएपी में क्ले मिट्टी जिप्सम की गोलियां, एसएसपी, एमओपी उर्वरकों में बालू एवं साधारण नमक, उर्वरक एनपीके में एसएसपी, रॉक फॉस्फेट, एनपीके मिश्रण, जिंक सल्फेट में मैगनिश्यिम सल्फेट तथा कॉपर सल्फेट एवं फेरस सल्फेट उर्वरक में बालू व साधारण नमक की मिलावट की जाती है | किसान इन  विधियो से कर सकते हैं मिलावटी...

मई-जून में ऐसे करें मिर्च की खेती, होगी अधिक उपज

मई-जून में ऐसे करें मिर्च की खेती, होगी अधिक उपज भारत के लगभग हर राज्य में मिर्च की खेती होती है. इसके फायदों को देखते हुए मुख्यत: नगदी फसलों की श्रेणी में इसे रखा जाता है. वैसे मिर्च में औषधीय गुणों का भंणार भी होता है. अगर किसान भाई जलवायु क्षेत्र के अनुसार मिर्च की उन्नत प्रजातियों का प्रयोग करें, तो उन्हें अच्छी कमाई हो सकती है. चलिए आज आपको मिर्च की खेती के बारे में बताते हैं. जलवायु मिर्च की खेती गर्म और आर्द्र जलवायु में की जाती है. हालांकि इसके फलों के पकने के लिए शुष्क मौसम चाहिए होता है. मिर्च एक गर्म मौसम की फ़सल है, इसलिए इसे उस समय तक नहीं उगाया जा सकता, जब तक कि मिट्टी का तापमान बढ़ न गया हो. मिट्टी इसकी खेती बैंगन और टमाटर की तरह ही होती है, इसलिए इसके लिए मिट्टी हल्की, भुरभुरी व पानी को जल्दी सोखने वाली होनी चाहिए. इसकी नर्सरी में पर्याप्त मात्रा में धूप का आना लाभदायक है. बुआई मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में मिर्च बोने के लिए सबसे अच्छा समय अप्रैल से जून तक का है. हालांकि बड़े फलों वाली क़िस्मों को मैदानी क्षेत्रों में अगस्त से सितम्बर तक भी बोया ज...