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समसामयिक सलाह:- मई माह में करे ये कृषि कार्य

  समसामयिक सलाह:- मई माह में करे ये कृषि कार्य ■ अनाजों को धूप में अच्छी तरह से सुखाकर भंडारण करें। ■ खेत की गहरी जुताई करें एवं पॉलीथीन से ढंक दें जिससे मृदा जनित खरपतवार, बीमारी एवं कीड़ों के अण्डे नष्ट होजाएं। ■खेत की ग्रीष्मकालीन जुताई हेतु मिट्टी पलट हल का प्रयोग गहरी जुताई हेतु करें। ■गर्मी की फसल एवं साग सब्जी की फसलों की सतत् निगरानी रखें एवं आवश्यकतानुसार उपयुक्त सिंचाई करें। ■आम, नीबू वर्गीय एवं अन्य फसलों में सिंचाई प्रबंधन करें। नये फल उद्यान हेतु तैयारी करें, फलदार वृक्षों हेतु निर्धारित दूरी पर गड्डे खोदकर छोड़ देवें। ■ किसान भाईयों को सलाह दी जाती है कि खरीफ में जिन फसलों की बुवाई करनी हो उनकी उन्नतशील जातियों के बीज की व्यवस्था जरूर कर लेंवे। ■टमाटर, बैगन, मिर्च, भिंडी एवं अन्य सब्जी वाली फसल में निंदाई गुड़ाई करें एवं आवश्यकतानुसार सिंचाई कर नत्रजन उर्वरक की मात्रा देवें। वातावरण में तापमान को देखते हुए सिंचाई की दर बढ़ा देवें। ■खरीफ फसल की बोनी के पूर्व खेतों में लगने वाले कृषि यंत्र एवं उपकरणों की व्यवस्था कर आवश्यक मरम्मत कर लेवें। ■फलदार वृक्ष लगाने हेतु गड्ढा खोद...

अग्नि अस्त्र:-कीटों को दूर भगाने का जैविक समाधान

   अग्नि अस्त्र:-कीटों को दूर भगाने का जैविक समाधान अधिकांश मानवीय बीमारियों का कारण जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ कृषि में उपयोग हो रहे रसायन भी हैं। इनमें मुख्य रूपसे मानव द्वारा उपयोग की जाने वाली विषाक्त सब्जियां, अनाज एवं फल हैं जिनकी सुरक्षा हेतु अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। इन कीटनाशकों के प्रयोग से अत्यधिक प्रयोग से इनके प्रति कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है और कुछ प्रजातियों में तो प्रतिरोधक क्षमता विकसित भी हो चुकी है। इसके अलावा रासायनिक कीटनाशक अत्यधिक महगे होने के कारण किसानों को इन पर अत्यधिक खर्च करना पड़ता है। कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से फसलों, सब्जियों व फलों की गुणवत्ता पर भी विपरीत असर पड़ता है। इन वस्तुस्थिति के फलस्वरूप वैज्ञानिकों का ध्यान प्राकतिक एवं जैविक कीटनाशकों एवं रोगनाशकों की ओर गया है जो न केवल सस्ते हैं बल्कि जिनके उपयोग से तैयार होने वाली फसल के किसी प्रकार के रासायनिक दुष्प्रभाव भी नहीं रहते हैं। आज की कड़ी में हम   ऐसे जैविक  कीटनाशक के बारे में बताएंगे जो कि आसानी से घर पर बनाये जा सकते है और...

उद्यानिकी-ताइवान रेड लेडी 786 पपीता उत्पादन /खेती कैसे करें ।

उद्यानिकी- ताइवान रेड लेडी 786 पपीता उत्पादन /खेती  कैसे करें । एक एकड़ में 4 लाख की कमाई करा सकता है पपीता,  ऐसे करें खेती पपीते की खेती के लिहाज से भारत एक उपयुक्‍त देश है। इसे अधिकतम 38 से 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होने पर उगाया जा सकता है।  ऐसा तापामान कमोबेश पूरे भारत में पाया जाता है। पपीता फार्मिंग के लिए जलवायु या उचित वातावरण पतीते की खेती के लिए न्‍यूनतम तापमान 5 डिग्री होना चाहिए। मतलब आप इसे पहाड़ों से सटे इलाकों में भी उगा सकते हैं।  इस लिहाज से आप भारत के किसी भी कोने में रहते हैं तो पपीते की खेती कर सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में पपीता की खेती की तरफ किसानों का रुझान बढ़ रहा है।  पैदावार की दृष्टि से यह हमारे देश का पांचवा लोकप्रिय फल है। यह बारहों महीने होता है, लेकिन यह फ़रवरी-मार्च से मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है, क्योंकि इसकी सफल खेती के लिए 10 डिग्री से. से 40 डिग्री से. तापमान उपयुक्त है। इसके फल विटामिन A और C के अच्छे स्त्रोत है। विटामिन के साथ पपीता में पपेन नामक एंजाइम पाया जाता है जो शरीर की अतिरिक्त चर्बी को हटाने में सहायक होता है। स्वास...

संभावना:- कृषकों के अतिरिक्त आय का साधन बन सकती है "मोती की खेती"

  संभावना:- कृषकों के अतिरिक्त आय का साधन बन सकती है "मोती की खेती" खेती तो सभी किसान करते हैं, कोई अनाज उगाता है तो कोई दलहन-तिलहन तो कोई साग-सब्जी तो कोई मक्का, कोदो -कुटकी, बाजरा। लेकिन पिछले कुछ दशक से कई युवा अच्छी खासी नौकरी छोड़कर कृषि की ओर बढ़ चले है जो अपने तकनीकी ज्ञान के कारण अन्य किसानों के लिये प्रेरणा के स्त्रोत तो बन ही रहे है एवम ये युवा परम्परागत तरीको के अलावा कम लागत लगाकर अधिक आमदनी पाने के अवसर तलाश रहे है। अगर आप भी किसान है और परम्परागत तरीकों के अलावा कृषि के अन्य स्वरूपों के बारे में ज्ञानवर्धन की जिज्ञासा रखते है तो आज का लेख आपके लिए है। आज की कड़ी में हम जानेंगे मोती की खेती के बारे में जो किसान भाइयों के अतिरिक्त आय का साधन बन सकती है। आजकल मोती की खेती चलन तेजी से बढ़ रहा है। कम मेहनत और लागत में अधिक मुनाफे का सौदा साबित हो रहा है। अभी तक उड़ीसा के सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर, भुवनेश्वर (ओडीसा) में मोती की खेती का प्रशिक्षण दिया जाता था, लेकिन अब कई जगह पर इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ऐसे होती है मोती की खेती मोती की खेती शुरू क...

खेती-बाड़ी:-जिमीकन्द(सूरन)की खेती कर देगी किसान को मालामाल

  खेती-बाड़ी:-जिमीकन्द (सूरन) की खेती कर देगी किसान को मालामाल जिमीकंद या सूरन एक भूमिगत कंद है| जो इसकी उपज क्षमता तथा पाक गुणों के कारण लोकप्रिय हो रहा हैं| उच्च उपज, गैर-तीखेपन वाले किस्मों के प्रवेश के कारण इसे पूरे भारत में व्यावसायिक उत्पादन हेतु अपनाया जा रहा हैं| यह कार्बोहाइड्रेट और खनिजों जैसे कैल्शियम और फॉस्फोरस से समृद्ध हैं| बवासीर, पेचिश, दमा, फेफड़ों की सूजन, उबकाई और पेट दर्द के रोकथाम हेतु अनेक आयुर्वेदिक दवाओं में इन कंदों का उपयोग किया जाता हैं| यह रक्त शोधक का कार्य भी करता हैं|      आज की कड़ी में हम जानेंगे जिमीकन्द की वैज्ञानिक खेती के बारे में। जिमीकंद खेती की तैयारी का समय आ चुका है अतः किसान भाई खेत की तैयारी शुरू कर दे वे इसके लिए सर्वप्रथम अपने खेत में जितना भी बायोमास पड़ा हुआ है बायोमास से मेरा तात्पर्य पिछली फसल अवशेष से है इस बायोमास को किसान भाई भूल कर भी ना जलाएं फसल अवशेष को जलाने से खाद नहीं बनता बल्कि हमारे खेतों के जैविक कार्बन सब जल जाते हैं मित्र बैक्टीरिया जो फसल उत्पादन में सहायता करते हैं सब मर जाते हैं और कुछ गिने-चुने केंचु...

कृषि:-ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई से कीटनाशक के पैसे बचा सकते है किसान।

  कृषि :- ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई से कीटनाशक के पैसे बचा सकते है किसान। रबी की फसल कटने के बाद किसान अपने खेत की गहरी जुताई कर दें, ताकि कम लागत में अधिक उत्पादन मिल सके। कतार में फसलों की बुवाई, फसल चक्र, सहफसली खेती, ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करने से कम लागत में अधिक उत्पादन मिलता है। रबी की फसलों की कटाई के बाद खेत की गहरी जुताई खरीफ की फसल के लिए भी लाभदायक है। ग्रीष्मकालीन जुताई मई और जून में मानसून आने से पहले की जाती है। इस जुताई से अनेक फायदे होते हैं। गहरी जुताई से जल, वायु और मिट्टी का प्रदूषण कम होता है।  मिट्टी में सुधार होता है और मिट्टी में पानी धारण करने की क्षमता बढ़ती है। खेत की कठोर परत को तोड़कर मिट्टी को जड़ों के विकास के अनुकूल बनाने के लिए ग्रीष्मकालीन जुताई लाभदायक होती है। जुताई से खेत में उगे खरपतवार और फसल अवशेष मिट्टी में दबकर सड़ जाते हैं, जिससे मिट्टी में जीवांश की मात्रा बढ़ जाती है। ज्यादातर किसान बुवाई से पहले ही खेत की जुताई करते हैं, जिससे फसल तो अच्छी हो जाती है, लेकिन खेत की मिट्टी में कई तरह के कीट, रोगाणु और खरपतवार बने रहते हैं, ऐसे में कि...

#काफल #उत्तराखंडी_फल

  #काफल #उत्तराखंडी_फल ■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■ ये फल मध्य हिमायली इलाकों में बहुतायत से पाया जाता है। उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाने वाला ये सदाबहार पेड़ होता है जिस पर गर्मियों के दिनों में बेहद ही स्वादिष्ट फल लगता है।  इस फल की गुणवत्ता बहुत है। ये ज्यादातर विटामिन से भरा होता है। इसमें आयरन भी भरपूर होता है।  ये पहाड़ी फल एंटी ऑक्सीडेंट से भरा होता है। खट्टाऔर मीठे स्वाद के इस फल के जूस में डायजेशन से जुड़ी सारी ही बीमारी को ठीक करने के गुण होते हैं।  इस फल में कई तरह के प्राकृतिक तत्व पाए जाते हैं। जैसे माइरिकेटिन, मैरिकिट्रिन और ग्लाइकोसाइड्स इसके अलावा इसकी पत्तियों में फ्लावेन -4-हाइड्रोक्सी-3 पाया जाता है। यदि आपके पास भी काफल से जुड़ी कोई जानकारी हो तो अवश्य साझा करें।