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सरसों की उन्नत किस्में किसानों को हर साल बीज खरीदने की जरूरत नहीं होती है क्योंकि बीज काफी महंगे आते हैं। इसलिए जो बीज आपने पिछले वर्ष बोया था यदि उसका उत्पादन या आपके किसी किसान साथी का उत्पादन बेहतरीन रहा हो तो आप उस बीज की सफाई और ग्रेडिंग करके उसमे से रोगमुक्त ओर मोटे दानों को अलग करें। इसके बाद बीजोपचार करके बुबाई करें तो भी अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे, लेकिन जिन किसान भाइयों के पास ऐसा बीज नहीं है वो निम्न किस्मों का बीज बुवाई कर सकते हैं। आर एच 30 :  यह किस्म सिंचित व असिंचित दोनों ही स्थितियों में अच्छा उत्पादन देती है। साथ इसे गेहूं, चना या फिर जौ के साथ भी बो सकते हैं। टी 59 (वरूणा):  इसकी उपज असिंचित 15 से 18 कुंतल प्रति हेक्टेयर होती है। इसमें तेल की मात्रा 36 प्रतिशत होती है। पूसा बोल्ड :- आर्शिवाद (आर. के. 01से 03) :  यह किस्म देरी से बुवाई के लिए (25 अक्टुबर से 15 नवम्बर तक) उपयुक्त पायी गई है। अरावली (आर.एन.393) :  सफेद रोली के लिए मध्यम प्रतिरोधी है। एनआरसी एचबी 101 :  सेवर भरतपुर से विकसित उन्नत किस्म है इसका उत्पादन बहुत शानदार रहा है, सिंचित क...

फसल अवशेष प्रबंधन

🌾 फसल अवशेष प्रबंधन तकनीकों की जानकारी के अभाव एवं कुछ किसान जानकारी होते हुए भी अनभिज्ञ बनकर फसल अवशेषों को जला रहे हैं। अवशेष प्रबंध्न फसल अवशेषों का प्रबंधन हमारे देश में उचित तरीके से नहीं किया जाता है। इसलिए यह हमारे लिए बहुत ही गंभीर समस्या बनती जा रही है। यह कहना भी सही होगा कि इसका उपयोग मृदा में जीवांश पदार्थों के रूप में न करके अधिकतर भाग को जलाकर नष्ट कर दिया जाता है या दूसरे घरेलू कार्यों में उपयोग कर लिया जाता है। एक अध्ययन के अनुसार फसल के अवशेषों का सिर्पफ 22 प्रतिशत ही इस्तेमाल होता है, शेष जला दिया जाता है। धान फसल की पराली के प्रबंधन के लिए  दिये  गये उपाय करने चाहिएः  पूसा डीकम्पोजर का उपयोग  यह भाकृअनपु-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा के वैज्ञानिकों द्वारा बनाया गया एक ऐसा छोटा कैप्सूल है, जो फसल अवशेषों को लाभदायक कृषि अपशिष्ट खाद में बदल देता है। एक कैप्सूल की कीमत सिर्पफ 4-5 रुपये है और एक एकड़ खेत के अवशेष को उपयोगी खाद में बदलने के लिए केवल 4 कैप्सूल की आवश्यकता होती है।  मिश्रण को तैयार और उपयोग करने की विधि सबसे पहले 150 ग्राम पुरान...

जीरो एनर्जी कूल चेम्बर:-फल एवं सब्जियों को ताजा रखने हेतु अपने खेत पर आसानी से बना सकते है।

जीरो एनर्जी कूल चेम्बर:-फल एवं सब्जियों को ताजा रखने हेतु अपने खेत पर आसानी से बना सकते है। ज़ीरो एनर्जी कूल चेम्बर उद्यानों से प्राप्त उत्पादनों के भंडारण के लिए एक कम लागत वाला चैंबर है। इसे खेत में ही निर्मित किया जा सकता है, जिसमें हम फलों, सब्जियों तथा फूलों को भंडारित कर ताजा रख सकते हैं। इससे हमें इन उपजों के विपणन में लाभ पहुंचता है। इन उपजों में अधिक मात्रा में नमी होने के कारण इनके खराब होने की अधिक संभावना रहती है। इसके अलावा चूंकि ये सजीव पदार्थ होते हैं, इसलिए कटाई के बाद भी इनमें प्रस्वेदन, श्वसन और परिपक्वन की प्रक्रिया चलती रहती है। भंडारण तापमान को नियंत्रित कर इन उद्यान उत्पादों को सड़ने से बचाया जा सकता है। इस ज़ीरो एनर्जी कूल चैंम्बर का निर्माण ईंट, रेत,बांस,खसखस/पुआल,बोरे जैसी मामूली चीजों से आसानी से किया जा सकता है। इस चैम्बर का तापमान 10-15 डिग्री सें. तक रखा जा सकता है,साथ ही इसकी नमी को 90% तक बनाई रखी जा सकती है। सूखे मौसम में यह काफी उपयोगी साबित होता है। निर्माण एक ऊंची भूमि का चयन करें, जिसके आस-पास जल आपूर्ति की व्यवस्था हो। 165 से.मी*115 से.मी*165 से.मी की ...

स्टिकी ट्रैप:-ये नीली-पीली पट्टियां आपकी फसल को कीड़ो से बचा सकती है।

    स्टिकी ट्रैप:- ये नीली-पीली पट्टियां आपकी फसल को कीड़ो से बचा सकती है। आधुनिक युग में कीटनाशकों का नाम मात्र भी इस्तेमाल न करते हुए खेतीबाड़ी करना थोड़ा कठिन है, लेकिन देशी तरीकों से खेतीबाड़ी में खर्च भी बहुत कम आता है। यह देशी चीजें आप को आपके इर्द –गिर्द ही मिल जाती हैं, बगैर किसी भाग दौड़ के, चाहे आप की फसल सब्जी की हो या अनाज की फसल हो,बगैर किसी रसायन के तैयार की जा सकती है। जिससे मानव जीवन पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता है, तथा उसकी कीमत भी रासायनिक फसलों से ज़्यादा मिलती है। किसान घातक कीटनाशकों के छिड़काव के बिना कीटों से अपनी फसल की रक्षा कर सकेंगे। रासायनिक दवाओं से कीट नियंत्रण में कई तरह की दिक्कत आती हैं, जिसमें कृषि पर्यावरण को कई तरह के नुकसान शामिल रहते हैं। जबकि स्टिकी ट्रैप के इस्तेमाल से किसान इन सभी दिक्कतों से बच सकता है। रासायनिक कीटनाशकों के लगातार इस्तेमाल से कई गंभीर खतरे पैदा होतेे रहते हैं। रसायन के ज्यादा इस्तेमाल से कीटों में रसायन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता, खाद्य शृंखला में कीटनाशक अवशेष, मृदा प्रदूषण, मित्र कीटों का अनचाहा नुकसान और पर्यावरण को कई...

जीरो बजट खेती की शुरुआत कर रहे है तो ये पोस्ट आपके लिये बहुत कम की है।

जीरो बजट खेती की शुरुआत कर रहे है तो ये पोस्ट आपके लिये बहुत कम की है। जीरो बजट का अर्थ है। चाहे कोई भी अन्य फसल हो या बागवानी की फसल हो। उसकी लागत का मूल्य जीरो होगा। मुख्य फसल का लागत मूल्य आंतरवर्तीय फ़सलों के या मिश्र फ़सलों के उत्पादन से निकाल लेना और मुख्य फसल बोनस रूप में लेना या आध्यात्मिक कृषि का जीरो बजट है। फ़सलों को बढ़ने के लिए और उपज लेने के लिए जिन-जिन संसाधनों की आवश्यकता होती है। वे सभी घर में ही उपलब्ध करना, किसी भी हालत में मंडी से या बाजार से खरीदकर नहीं लाना। यही जीरो बजट खेती है। हमारा नारा है। गांव का पैसा गांव में, गांव का पैसा शहरों में नहीं। बल्कि शहर का पैसा गांव में लाना ही गांव का जीरो बजट है। फ़सलों को बढ़ने के लिए जो संसाधन चाहिए वह उनके जड़ों के पास भूमि में और पत्तों के पास वातावरण में ही पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। ऊपर से कुछ भी देने की जरुरत नहीं। क्योंकि हमारी भूमि अन्नपूर्णा है। हमारी फसलें भूमि से कितने तत्व लेती है। केवल 1.5 से 2.0 प्रतिशत लेती है। बाकी 98 से 98.5% हवा सूरज की रोशनी और पानी से लेती है। उद्देश्य :- खेती की लागत कम करके अधिक लाभ ...

समसामयिक सलाह-धान की फसल में खरपतवार नियंत्रण कैसे करे।

समसामयिक सलाह-धान की फसल में खरपतवार नियंत्रण कैसे करे? देश की बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ खाद्यानों की मांग को पूरा करना एक गम्भीर चुनौती बनी हुई है । धान हमारे देश की प्रमुख खाद्यान फ़सल है । इसकी खेती विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में लगभग 4 करोड़ 22 लाख है0 क्षेत्र में की जाती है आजकल धान का उत्पादन लगभग 9 करोड़ टन तक पहुंच गया है । राष्ट्रीय स्तर पर धान कीऔसत पैदावार 20 क्विंटल प्रति हैक्‍टेयर है। जो कि इसकी क्षमता से काफ़ी कम है, इसके प्रमुख कारण है - कीट एवं ब्याधियां, बीज की गुणवत्ता, गलत शस्य क्रियाएं, तथा खरपतवार। धान की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिये सुधरी खेती की सभी प्रायोगिक विधियों को अपनाना आवश्यक है , हमारे देश में धान की खेती मुख्यतया दो परिस्थितियों में की जाती है 1 वर्षा आधारित , 2 सिंचित ऊची भूमि में वर्षा आधारित खेती में नींदा नियन्त्रण एक बड़ी समस्या है ,यदि इसका समय से नियन्त्रण न किया जाये तो फ़सल पूरी तरह नष्ट हो जाती है। जहां पर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है वहां पर रोपाई या बुवाई से पहले मचाई करने से नींदा पर काफ़ी नियन्त्रण पाया जा सकता है । इस वर्ष मानसू...

समसामयिक कृषि सलाह:-अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में लेही पद्धति और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कतार बोनी करें।

अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में लेही पद्धति और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कतार बोनी करें। ■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■ छत्तीसगढ़ राज्य में वर्षा की वर्तमान स्थिति एवं समसामयिक कृषि परामर्श छत्तीसगढ़ राज्य में 13 जुलाई 2022 में वर्षा की स्थिति सामान्य है। 13 जुलाई तक राज्य में 344 मिमी हो जानी चाहिए थी परंतु वर्तमान में 357 मिमी वर्षा हो चुकी है, जो सामान्य से अधिक है, परंतु वर्षा का वितरण विभिन्न जिलों में असामान्य है। बस्तर के पठार क्षेत्र के 6 जिलों में से 2 जिलों (कोंडागांव एवं नारायणपुर) में सामान्य से अधिक वर्षा, 3 जिलों (बस्तर, सुकमा एवं दंतेवाड़ा) में सामान्य वर्षा व 1 जिले (बीजापुर) में सामान्य से अत्यधिक वर्षा हुई है।  जबकि छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग के 16 जिलों में से 7 जिलों (बालोद, धमतरी, कांकेर, राजनांदगांव, मुंगेली कबीरधाम एवं गरियाबंद) में सामान्य से अधिक वर्षा, 5 जिलों (जांजगीर, बिलासपुर, बलौदाबाजार, दुर्ग एवं महासमुंद) में सामान्य वर्षा व 4 जिलों (बेमेतरा, रायगढ़, कोरबा एवं रायपुर) में सामान्य से कम वर्षा हुई है। कम वर्षा वाले जिलों में कमी का प्रतिशत -23 से -38 ह...